सत्यवीर सिंह जी ज्ञान(म) जी अजॆय जी
नित्य सूर्य कॆ समान मार्ग तॊ दिखा रहॆ।
आप की ज़ुबान से बह रही सुवाणी की
माप तो न कर सके, धन्य धन्य हम रहे।
राज्य-राज्य भिन्न हो ध्यॆय एक ही रहॆ
आज हिंदी का सही रूप सीख लेंगे हम।
15-10-2007
(कॆंद्रीय हिंदी संस्थान, मैसूर केंद्र के द्वारा आयोजित शिक्षक नवीकरण कार्यक्रम के संदर्भ में…)
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